- मनुष्य का भाग्य कोई भी नहीं जनता कब भाग्य मनुष्य के सामने प्रगट हो जाये और उसको रंक से राजा बना दे और कब उसके सामने दुर्भाग्य प्रगट हो जाये और उसको राजा से रंक बना देवे इसको शायद ईश्वर ही जनता होगा, लेकिन कुछ वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्ति कहते है की कर्म से भाग्य बनता है यह भी बहुत हद तक सही भी है यदि यह दोनों ही बाते सही हैं तो दोनों में कोई न कोई तो श्रेष्ठ होगा ही। यह कहानी इसी बात पर अपना विचार प्रकट कराती है और विश्लेषण करना पाठको पर छोड़ती है।घटना एक ऐसे आदमी से सम्बंधित जो की बेहद ईमानदार और मेहनती थे:और सरकारी विभाग सुपरवाईजरी की नौकरी करते थे । वे अपना कार्य बड़ी ही तन्यमयता और परिश्रम से करते थे।इनका नाम रमेश था। इसके साथ ही वो अपने प्रमोशन को ध्यान में रख कर सम्बंधित किताबो की पढाई भी किया करते थे। लेकिन भाग्य कहिये या फिर उनकी पढाई में खोट कहिये वो जब भी परीछा में बैठते थे तो लिखित परीछा को पास कर लेने बावजूद भी आज तक कोई साक्षात्कार पास नहीं कर पाए थे । उनकी भर्ती जिस पद पर हुई थी उसी पद पर आज भी थे। आखिर कर हारकर उन्होंने पढाई लिखाई छोड़ कर जिंदगी का आनन्द लेते हुए परीछा देने का फैसला लिया। और इसके लिए वो अपनी पोस्टिंग स्थान और कार्य की प्रकृत को नजर अंदाज़ करते हुए एक बार सिनेमा देखने अपना मुख्यालय छोड़ कर जिला मुख्यालय चले गए। सिनेमा देखने के पश्चात् वो जल्दी से स्टेशन पहुँच कर ट्रेन पकड़ कर अपने मुख्यालय पहुंचना चाहते थे। लेकिन स्टेशन पर पहुँचने पर पता चला की अभी डिप्टी साहब आएंगे तभी ट्रेन चलेगी; उधर जनता ट्रेन चलने का इंतजार करते करते उबने लगी तो जाकर स्टेशन मास्टर पूछने लगी कि साहब ट्रेन ट्रेन क्यों नहीं चला रहें हैं।इसी दौरान कुछ लोग स्टेशन मास्टर साहब से विवाद करने लगे की आप ट्रेन क्यों नहीं चला रहे पहले तो स्टेशन मास्टर साहब ने इधर उधर की बात बनाने का प्रयास किया लेकिन जब वह जनता के तर्कों का कोई उत्तर न दे सके तो उन्होंने झल्ला कर सही बात बता दिया जो अभी तक वो छिपा रहे थे ,की डिप्टी साहब अभी आयेंगे तो यह ट्रेन चलेगी। अब सिनेमा समाप्त ही होने वाला होगा या सिनेमा समाप्त हो गया होगा। इतना सुनना था की जनता भड़क गई और उलुल जुलूल बात बोलने लगी कुछ ने तो स्टेशन मास्टर पर अपशब्दों का बौछार शुरू कर दिया। इतने में डिप्टी साहब शायद सिनेमा समाप्त हो जाने के कारण स्टेशन पर आ गए और स्टेशन से लाउड स्पीकर पर यह बोला जाने लगा की सभी यात्रियों से अनुरोध है की सभी लोग ट्रेन में अपने अपने स्थान पर बैठे ट्रेन चलने वाली है। इतना सुनना था की यात्री ट्रैन की तरफ बढे और मामले से बेखबर डिप्टी साहब भी ट्रैन की तरफ अपने खैरख्वाह मातहतों से पुरसाहाली करवाते हुए अपने कोच की तरफ बढ़ ही रहे थे कि किसी यात्री की निगाह उनके ऊपर पड़ी और वो चिल्ला पड़ा देखो यही डिप्टी है जिसके कारण ट्रेन इतनी देर से रुकी है इतना सुनना था कि भीड़ में से किसी ने बोला कि मारो इसी के कारण हम लोग यहाँ अनायास लगभग एक घण्टे से माखी मर रहे हैं इतना सुनना था कि पता नहीं किसने पहला हाथ उठा कर डिप्टी साहब के ऊपर पहला प्रहार किया इसका तो पता न चाल सका लेकिन उसके बाद सैकड़ो हाथ उठ्ने लगे और डिप्टी साहब के ऊपर गिरने लगे इतने में घटना देख रहे रमेश बाबू अपने वफादारी परिचय तुरंत डिप्टी साहब के ऊपर लेट गए आखरी कर रमेश बाबू ऐसा क्यों नहीं करते वो उनके डिप्टी थे। अब जो भी हाथ ऊपर उठे एक आध हाथ रमेश बाबू को पड़े लेकिन जनता उनको ऊपर से हटा कर अपने बर्बाद हुए समय का हिसाब लगता है डिप्टी साहब को मार कर निकाल लेना चाहती थी , लेकिन रमेश बाबू डिप्टी साहब के ऊपर से हटने को तैयार न थे इस धक्का मुक्की में एक आद हाथ रमेश बाबू को भी पड़े लेकिन उन्होंने अपने वफादारी का परिचय देते हुए इस चोट को बर्दास्त किया। इतने में दो चार पुलिस के लोगों के आ गये इस कारण से यात्रियों ने सोचा की बात का बतंगड़ न हो जाये सारे यात्री अपने अपने कोच में दौड़ कर चले गए । इसके पश्चात् रमेश बाबू तुरन्त अपने डिप्टी साहब के ऊपर से उठे और डिप्टी साहब को उठने का मौका दे कर उनके भी कपड़ों के धुल धक्कड़ को झाड़ना शुरू कर दिया। इसके पश्चात् डिप्टी साहब से पूछने लगे कि कोई खास चोट तो नहीं लगी। डिप्टी साहब ने इस बात का उत्तर न देकर बोला की जनता भी कितनी उद्दंड होती है इसका आज तक मुझे पता नहीं था, आज तक मैंने अपने कर्मचारियों पर ही शासन किया था उनको जैसे चाह वैसे बोला उनकी ऐसी की तैसी किया लेकिन किसी की बोलने की हिम्मत नहीं पड़ती थी। इसी बात ने हमें बद दिमाग बना दिया था और इसका फल हमें ईश्वर ने दे दिया। अब मैं पूरी जिन्दगी भर इस बात को गाठ बांध कर रखूँगा की जनता से जुड़े मामलों में फैसला बड़ी सावधानी से लेनी है। बात को पलटते हुए डिप्टी साहब ने रमेश बाबू से बोला और बोलो रमेश तुम यहाँ कैसे आये थे। साहब इलाके के दौरे पर आया था तो पता चला की डिप्टी साहब यहाँ आये हैं तो सोचा चलो आप से मिलता चलू तब तक यह घटना हो गई। अच्छा रमेश इस घटना का जिक्र किसी से भी न करना। साहब आप भी क्या कह रहे हैं यह भी कोई जिक्र करने वाली बात है। इसके पश्चात दोनों लोग अपने अपने रास्ते चले गए। दूसरे दिन डिप्टी साहब ऑफिस अपने को सहज रखते हुए पहुँचे किन्तु ऑफिस के स्टाफ कौतुहलता से दबी नज़रों से उनको देखना चाह रहे थे पता नहीं यह बात ऑफिस के स्टाफ को पता चल गया था क्या।
- इस घटना बीते कई वर्ष हो गए और शायद सारे लोग इसे भूल भी गए थे सब कुछ सामान्य चल रहा था , इसी दौरान प्रोन्नति के लिये एक विभागीय परीक्षा की वेकन्सी निकली जिसके लिए सारे योग्य उमीदवार परीक्षा में बैठने के लिए फार्म भरने लगे फार्म भरने वालों में रमेश बाबू भी थे उन्होंने बड़े अनमने मन से फार्म भरा क्योकि वो कई बार इस के लिए फार्म भर चुके थे और किन्तु पिछले कई बार से लिखित परीक्षा में पास होने के वावजूद फाइनल सलेक्शन न होने के कारण उनका मन अनमना से परीक्षा में बैठने के लिये बना रहता था; लेकिन उन्होंने सोचा की चलो सब फार्म भर रहे हैं तो चलो मैं भी फार्म भर देता हूँ कौन सा पैसा लग रहा है। यह सोच विचार कर उन्होंने फार्म भर दिया और सोचा की चलो बहती गंगा में हाथ धो लिया जय। आदमी भाग्य कौन जनता है कब भाग्य रंक से राजा बना दे और कब दुर्भाग्य राजा से रंक बना दे। और उन्होंने सामान्य पढाई शुरू कर दिया। इस परीक्षा की कमेटी में वही डिप्टी साहब थे जिनका बचाव रमेश बाबू ने अपनी जान पर खेल किया था सोचा चलो एक दिन डिप्टी साहब से मिल लेता हूँ और एक बार उनको नमस्ते कर लेता हूँ ,ये सोच कर रमेश बाबू एक दिन डिप्टी साहब के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और बोले साहब मैंने भी प्रोन्नति परीछा का फॉर्म भरा है मै आप की दया दृष्टि अपने ऊपर चाहता हूँ। डिप्टी साहब ने भी उनकी बात को सुना और बोलै अच्छी तरह तैयारी कर परीक्षा में बैठिये भगवान चाहेगा तो आप का सलेक्शन हो कर रहेगा।
- रमेश बाबू को डिप्टी साहब की तरफ कोई अस्पष्ट आश्वाशन न मिलने पर वह अपने मन ही मन में भुनभुनानें लगे ये अधिकारी ऐसे ही होते है इनके साथ किसी भी स्तर का उपकार कर दो किन्तु ये उसी तरह बात भूलते हैं जैसे देश के नेता अपने चुनावी वादे को भूलते हैं। खैर समय बिता बात बीती परीक्षा का समय आया परीक्षा हुआ रमेश बाबू भी परीक्षा दिए ;किन्तु रमेश बाबू ने मह्शूश किया कि इस बार परीक्षा पहले दिये गये परीक्षा से कुछ ख़राब ही हुआ है।
- समय आने पर परीक्षा का परिणाम आया ,उसमे रमेश बाबू का नाम सफल प्रत्याशियों में सबसे ऊपर था। रमेश बाबू डिप्टी साहब के चैम्बर में गये उनके सामने कुछ बोल नहीं पाये उनके आखों में कृतज्ञता के आसूं थे वो केवल उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़े रहे ,डिप्टी साहब , रमेश बाबू के मनोभावों को समझते हुए बोले ये आप के परिश्रम का परिणाम है ,नहीं साहब आप की बहुत बड़ी कृपा है। रमेश बाबू मन ही मन सोच रहे थे बड़े आदमी बड़े ही होते हैं।साच्छात्कार का दिन आया सारे सफल अभ्यर्थियों का साच्छात्कार हुआ ,परिणाम निकला उसमे भी रमेश बाबू का नाम प्रथम स्थान पर था।
- रमेश बाबू को ऑफिस में बधाईयों का ताता लग गया आखिर कर लोग बधाई क्यों न देते रमेश बाबू अब से अधिकारी हो गये थे। किन्तु ऑफिस स्टाफ के मन में कहीं न कही यह बात बैठी थी की रमेश बाबू का यह प्रोनति डिप्टी साहब की अनुकम्पा का ही कहीं न कहीं परिणाम है। हो जो कुछ भी आज के दिन से रमेश बाबू अधिकारी थे आखरी कर परिणाम तो परिणाम होता है और अन्तोगत्वा वही मायने रखता हैं। कुछ लोग इसे रमेश बाबू के भाग्य का खेल मानते थे तो कुछ लोग उनके द्वारा किये गये कर्म और सही समय पर लिए गए उचित निर्णय का परिणाम मानते थे।
Wednesday, May 3, 2017
bhayag ka khel
Sunday, November 29, 2015
bahurupiya abhineta
इस दुनिया में मनुष्य के ब्यवहार को समझने जितना कठिन कार्य शायद ही दूसरा हो वह जो बोल रहा है उसके पीछे उसका उद्देष्य क्या है केवल वही जानता है उसको शायद भगवान भी नहीं जानते होंगें अगर भगवान जान भी जाये तो कब उसके आचरण से धोखा खा जाये वो नहीं जानते होंगें। ऐसे ही एक अभिनेता थे जो बहुत न्याय संगत बातों के लिए जाने जाते थे। एक बार एक गांव में फिल्म शूटिंग दौरान उसी गांव के एक व्यक्ति का गाना उनको इतना पसंद आ गया की उसको वो अपने फिल्म में लेने को तैयार हो गए उसको मात्र बीस हजार रुपये ही देने का करार हुआ। जब फिल्म बनकर तैयार हुई और वो गाना जब जनता के बीच रिलीज़ किया गया तो वो गाना सुपर हिट हो गया। इसके बावजूद जब उस गावँ के गायक को पैसा देने की बात आई तो अभिनेता जी उसको कुछ पैसा दे कर छुटकारा पा लेना चाहते थे। किन्तु वो आदमी भी इन्ही कुछ दिनों में लगता था ,देश दुनिया की रीत नीत को समझने लगा था वो कुछ लोगों के साथ अखबार वालों के पास अपनी बातों को लेकर पहुँचा तो अखबार वाले भी खूब चटपटा बनाकर खबर को छापने लगे। यह सारा माजरा देख अभिनेता जी को अपनी प्रतिष्ठा पर आंच आता हुआ महशूस हुआ तो जो अभिनेता जी कुछ पैसा देकर छुटकारा पा लेना चाहते थे तय पैसों से चार गुना पैसे देकर अपनी प्रतिष्ठा बचाने में सफल हो गये और मीडिया में यह बात समाचार के रूप में प्रचारित होनें लगा कि देखिये ये हमारे अभिनेता कितने उदार हैं की इन्होने तय पैसे ज्यादा पैसा देकर अपनी उदारता का परिचय दिया।लेकिन समझने वाले समझ रहे थे कि जिस आदमी का ईमान थोड़े से पैसे के लिये गिर जाये उसकी विश्वश्नीयता देश ,समाज, और खुद उसके परिवार के लिए ठीक नहीं है समय आने पर यह उजागर हो कर रहेगा।
Tuesday, November 17, 2015
neta ji bahbaliya
नेता जी हैं तो एक राज्य के मुख्यमंत्री हैं किन्तु इनका अपने राज्य काम में मन कम बल्कि दूसरे की कामों में दखल देने यां यों कहे की दूसरों को नीचा दिखाने यां उसको परेसानी में डालने में बड़ा मजा आता है । इस हेतु वो कोई भी मौका नहीं चूकते है । नेता जी आज तक कोई ऐसा कार्य जनता के सामने नहीं कर के दिखा सके है । जिससे जनता विस्वास कर सके कि नेता जी जनता के हित के बारे में भी कभी कुछ सोचते हों। ऐसे ही एक मुद्दा था जिससे नेता जी का दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नही था और जो लगभग चालीस सालों से विचारधीन था पिछली सरकारों के लेकिन उसका कोई समाधान नहीं निकल पा रहा था किन्तु जब उनके समकालीन सरकार ने इसका समाधान निकाल दिया जिससे लगभग सारे अन्सन पर बैठे कर्मचारी संतुष्ट नजर आ रहे थे तथा उनमे एक-दो प्रतिशत असंतुष्ट नजर आ रहे थे फिर भी सरकार ने इस बात का आष्वासन दे रखा था कि मैं अपने असंतुष्ट कर्मचारी भाईओं की मांगो पर विचार करने को तैयार हूँ आप अपनी मांगों को मेरे सामने प्रस्तुत करे। किन्तु उनमे से कुछ असंतुष्ट कर्मचारी फिर से अनसन पर बैठने के लिए उद्दत दिखे और फिर से अनसन पर बैठ गए। इस घटना को नेता जी ने एक अवसर के रूप में देखा और तुरंत अनसन करने वाले स्थल पर पहुँच कर मुसकराते हुये अपना समर्थन देते हुए ऐसा महसूस कर रहे थे कि जैसे उन्होने सारा जग जीत लिया है आखरी कार नेता जी खुश क्यों न होते उनके इस तरह के कारनामों से सम्बंधित सरकार जो परेशान होने वाली थी. किन्तु इस घटना से जनता में यह संदेश गया कि नेता जी का काम अब अपना काम छोड़ कर हर उस मामले में हस्तछेप करना है जिससे की जो सरकार देश हित में कार्य कर रही है वो न कर सके,और वो इसी तरह के मामलों से घिरी रहे और कोई देश हित में कार्य न कर सके और सरकार जनता नजर में नक्कारा मान ली जावे। अब नेता जी अपने बहबल पने में हर उस काम को करने में उद्दत रहते हैं जिससे भले ही उनका कोई लाभ न हो लेकिन उनकी सरकार को छोड़ कर दूसरी सरकारें परेसान रहे और चाहे उनके इन कारनामो से देश का किसी भी स्तर का नुकसान क्यों न हो। ,किन्तु जनता भी अब नेता जी की बातों को समझने लगी है और उनकी बातो को गम्भीरता लेना बंद कर दिया है।
Friday, September 12, 2014
wah neta jee
वर्षात के मौसम में जैसे मेढक टर टर बोलने लगते है जैसे ही वर्षा शुरू होती हैं। वैसे ही देश के नेता देश में चुनाव की घोषणा होने का अनुमान होने पर ही आपने भाषणों तथा लोकोक्तियों से अपने को बेदाग तथा दूसरे को महा बैमान,चोर,और घूसखोर तथा अन्य बुरे विशेषणों से विभूषित करना शुरु कर दिया। इसके साथ ही जैसे मौसम अपने अनुकूल पाकर भिन्न-भिन्न किट पतंगों का जन्म होता हैं वैसे ही चुनाव कि आह्ट होने पर कुछ नई पार्टिओं का भी जन्म हुआ इनमे से एक ऐसी पार्टी थी जो अपने को आम जनता कि पार्टी बतानें लगीं और नाम भी कुछ ऎसा रखीं कीं लोगोँ को कुछ कुछ भ्रम भी होने लगा कि जैसे यह आम जानता कि ही पार्टी हो। कुछ समय के बाद देश की राजधानी में चुनाव का घोसणा होने वाला था, इस बात को ध्यान में रखकर नेता जी अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार जोर शोर से करने लगे। वो जनता के बीच जाते और कुछ ऐसे जनता के लिए मन लुभावन बातो को करने लगे(भले ही सरकार को उस घोसणा से कितना भी घटा हो) की जनता उनको वोट देने के लिए उद्दत सी नजर आने लगी . राजधानी में चुनाव हुआ जनता का अच्छा जनसमर्थन नेता जी के पार्टी को मिला। नेता जी के पार्टी को पूर्ण बहुमत से कुछ सीटें कम मिली नेता जी इस बात का सहारा ले कर सरकार बनाने से भागते से नजर आने लगे। किन्तु इनकी धुर विरोधी पार्टी ने इनको समर्थन देने का एलान करके इनको भागने का रास्ता बंद कर दिया. यह देख कर कि अब सरकार बनाने से भागने सूरत नहीं है, नेता जी ने कुछ ऐसी शर्तों को रखना शुरू कर दिया जिससे समर्थन देने वाली पार्टियाँ समर्थन देने से पीछे हट जावे लेकिन समर्थन देने वाली पार्टियों को पीछे हटता न देख कर मजबूरी में नेता जी को सरकार बनाना पड़ा. नेता जी को सरकार चलाने का ऐसा कोई अनुभव तो था नहीं जब उन्होने सत्ता संभाली तब उन्हें सरकार चलाने की जटिलताओं का अनुभव होने लगा। ऐसे ही उन्होने अपने को जनता का बहुत बडा सेवक साबित करने के लिए लोक अदालत लगाकर जनता की परेशानियों का समाधान करने का दिखावा किया किन्तु उसमे भी असफल होता देख कर जनता के बीच में एक सगुफा छोड़ दिया की अब जनता समस्याओं को नई योजना लाकर दूर करेंगें। इस तरह इनके सरकार का समय नए नए सगूफों साथ बीतता रहा। कभी बोल देते कि मैंने जनता के लिये विजली बिल में पचास प्रतिशत का छूट कर दिया तो कभी कहते कि मैनें लिए पानी की खपत में इतना छूट कर दिया है जिसे आज तक कोई सरकार नहीं कर सकी है। लकिन सारी घोसनाये मुहजबानी शायद इनका कागज पर कोई अस्तित्व नहीं था। कुछ दिनों के बाद जब नेता जी को यह महशूश होने लगा कि जनता बातों को समझनें लगी है तो नेता जी जनता को पलझाने लिए जनता के हित में एक नया कानून लाने का नाटक करने लगे , जिसको लाने का ऐसा तरीका अपनाने लगे कि समर्थन देने वाली पार्टियाँ भी अपना कदम पीछे खीच लें वही हुआ नेता जी चाहते थे नेता जी की सरकार गिर जावे नेता जी की सरकार गिर गई नेता जी सरकार गिराने का दोष अपने प्रतिद्वंदियों को दे रहे थे प्रतिद्वन्दी नेता जी को। नेता जी देश का करोड़ो रुपयों बेकार कर चूके थे , अब जनता को नए तरीके से बेवकूफ बनाने का रास्ता नेता जी ढूढ़ रहे थे।
Monday, February 21, 2011
दिखावटी
दिखावटी
Thursday, October 14, 2010
नादान नेता
यह कितना बड़ा आश्चर्य हैकि जो आदमी जिस देश से अन्न, हवा ,पानी पाता उसी देश का विरोध कर रहा है यह कार्य और कही नहीं कश्मीर में हो रहा है। यह कार्य वहां कि विद्रोही जनता कर रही हो तो एक बात है लेकिन जब समय समय अपने स्वार्थ के लिए जब वहां के सत्ता रूढ़ नेता अपने स्वार्थ से वशीभूत होकर अपने स्वार्थ के लिए उलुल जुलूल बातों को बोलने लगते, स्वार्थ पूर्ण बयान देने लगते हैं तो आश्चर्य होता है इसके साथ कभी दिखाते हैं कि देखो मै नई दिल्ली के कितना नजदीक हूँ इससे भी नादान वो नेता लगते है जो दिल्ली में बैठें हैं जो समय समय पर उनकी बातों को समझ नहीं पाते बल्कि उनकी बातों में फंसकर उनका समर्थन कर बैठते हैं उनके नेता गिरी पर आसूं बहाने का मन होता है।
Monday, December 21, 2009
Friday, May 1, 2009
Monday, March 16, 2009
सच्चा दोस्त
खरे और अच्छे दोस्त की क्या पहचान है यदि आप लोंगो के पास इसका जो भी सही उत्तर हो तो मुझे बताने की कृपा करे।
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